बत्ताँ (पगडंडियाँ)
ताणेयाँ-बाणेयाँ तणदियाँ बत्ताँ।
इंञा ही नीं थियाँ बणदियाँ बत्ताँ।
अपणे-निपणे कन्नै जुडने दियाँ,
जरूरत्ताँ ही थियाँ जणदियाँ बत्ताँ।
भलेयाँ लोकां थियाँ लगाइयाँ बत्ताँ।
पहाड़ां पैड़ी-पैड़ी गुहाइयाँ बत्ताँ।
सब्भना दा चलणा-फिरना सौखा होये,
धर्मात्मेयाँ छैळ चिणाइयाँ बत्ताँ।
सिद्धियाँ चढ़ाइयाँ गौंह्दियाँ बत्ताँ।
धारां परले पासैं लौंह्दियाँ बत्ताँ।
बाँईं - पढैंदाँ, खेत - खड़ैतराँ जो,
जाई नै थियाँ सैह् छौंह्दियाँ बत्ताँ।
कुत्थी खड़ियाँ कुत्थी पड़ियाँ बत्ताँ।
सपाट पत्थराँ कन्नै जड़ियाँ बत्ताँ।
चलदे मुसाफराँ जो छाँऊं मिल्ले,
रुक्खाँ कन्नै थियाँ मह्ड़ियाँ बत्ताँ।
चाँयें-चाँयें लोक चिणांदे बत्ताँ।
विधि विधान कन्नै पुजाँदे बत्ताँ।
फिरी अपणे पुन्न बद्धाणे ताँईं,
सैह् साफ-सुथरा थे रखाँदे बत्ताँ।
लम्में फेराँ ते बचाँदियाँ बत्ताँ।
अपणेयाँ कन्नै मिलाँदियाँ बत्ताँ।
दिल चाहे ताँ कोई दूर नीं होंदा,
एही सब्भना जो गलाँदियाँ बत्ताँ।
टियाळेयाँ बक्खें खडौंदियाँ बत्ताँ।
घणियाँ छाँउआँ च बसौंदियाँ बत्ताँ।
ठंडा पाणी पी करी भरोआँ दा,
गाँह् फिरी थियाँ चली पौंदियाँ बत्ताँ।
कई अणमुले पाठ पढाँदियाँ बत्ताँ।
अग्गैं बद्धणे जो उकसाँदियाँ बत्ताँ।
चळणा ही जिंदगी है 'भगता',
जगत मुसाफराँ जो समझाँदियाँ बत्ताँ।
संगड़ियाँ कुत्थी चौड़ियाँ बत्ताँ।
सिद्धियाँ कुत्थी मरौह्ड़ियाँ बत्ताँ।
अज्जकल थकी-मुकी गइयाँ भगता,
रैंह्दियाँ थीं कदी दौह्ड़ियाँ बत्ताँ।
चौड़ियाँ सड़काँ नै जिक्कियाँ बत्ताँ।
लुप्त होंइयाँ सैह् हुण निक्कियाँ बत्ताँ।
बदळदे बग्त दियाँ ज़रूरताँ अग्गें,
नोंयें जमानें च नीं टिक्कियाँ बत्ताँ।
© भगत राम मंडोत्रा
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